”सहकारी व्यापार मेले में नवाचारी मत्स्य प्रौद्योगिकियों का किया गया प्रदर्शन”
डॉ. मुरुगानंदम ने प्राकृतिक संसाधन संरक्षण से जुड़ी एकीकृत मत्स्य पालन प्रणालियों के लाभों पर विशेष बल दिया। उन्होंने उत्तराखंड के पर्वतीय गाँवों की सांस्कृतिक एवं कार्यात्मक पहचान मानी जाने वाली पारंपरिक जल चक्कियों (घराट) को मत्स्य पालन प्रणालियों से जोड़ने की अभिनव अवधारणा प्रस्तुत की। घराटों से निकलने वाला ऑक्सीजन-समृद्ध जल तथा अनाज पिसाई से प्राप्त जैविक अवशेषों का उपयोग मत्स्य तालाबों में किया जा सकता है, साथ ही इन्हें कुक्कुट पालन एवं सूअर पालन जैसे सहायक उद्यमों के साथ भी जोड़ा जा सकता है। इस दृष्टिकोण के अंतर्गत प्ब्।त्दृप्प्ैॅब् द्वारा विकसित तकनीकों से 100 वर्ग मीटर क्षेत्र से लगभग 50 किलोग्राम मछली उत्पादन की क्षमता प्रदर्शित हुई है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ किया जा सकता है। उन्होंने सुधारित कार्प मत्स्य पालन तकनीकों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें संशोधित बीज संचयन घनत्व एवं कटाई कैलेंडर शामिल हैं। फरवरी-मार्च के दौरान 1-2 मछली प्रति वर्ग मीटर की दर से बीज संचयन, परंपरागत रूप से अपनाए जाने वाले जुलाई-सितंबर के उच्च घनत्व वाले संचयन की तुलना में अधिक उत्पादक सिद्ध हुआ है। इन उन्नत तकनीकों से पर्वतीय परिस्थितियों में 100 वर्ग मीटर से 45-50 किलोग्राम मछली उत्पादन संभव हुआ है, जिसके माध्यम से किसानों ने अपने तालाबों में उत्पादन को 800 किलोग्राम से बढ़ाकर लगभग 2.5 टन/हे तक किया है।
एक अन्य महत्वपूर्ण तकनीक के रूप में धान, मत्स्य पालन प्रणाली पर चर्चा की गई, जो क्षेत्र की धान आधारित पारिस्थितिकी का उपयोग करती है। खेतों की मेड़ों को सुदृढ़ कर, खाइयाँ एवं शरण तालाब बनाकर तथा निरंतर जल उपलब्धता सुनिश्चित कर धान की खेती के साथ मत्स्य पालन को सफलतापूर्वक एकीकृत किया जा सकता है। उन्नत आकार के मत्स्य बीजों के संचयन से तेज़ वृद्धि एवं अधिक लाभ प्राप्त होता है। धान के खेतों में केवल लगभग 4 प्रतिशत क्षेत्र को शरण संरचनाओं हेतु आवंटित कर 600-900 किलोग्राम मछली प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष उत्पादन प्राप्त हुआ, साथ ही एकीकृत प्रणाली के कारण धान उत्पादन में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि भी दर्ज की गई। डॉ. मुरुगानंदम ने वैज्ञानिक ढंग से डिज़ाइन किए गए फार्म तालाबों एवं जल-संग्रह संरचनाओं के महत्व पर भी प्रकाश डाला, जिनमें इनलेट आउटलेट प्रणाली, तलछट अवरोध संरचनाएँ, अतिरिक्त वर्षा-अपवाह को सुरक्षित रूप से बाहर निकालने हेतु डायवर्जन नालियाँ, 1-1.5 मीटर की उपयुक्त तालाब गहराई, उर्वरक घोलने हेतु सोक पिट्स तथा समीपवर्ती कटाई एवं संग्रह व्यवस्थाएँ शामिल हैं। इसके साथ ही उन्होंने जलागम आधारित मत्स्य विकास की अवधारणा समझाई, जिसमें मृदा एवं जल संरक्षण उपायों को नदीय मत्स्य संसाधनों, जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी सेवाओं के संवर्धन से जोड़ा जाता है।

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