इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए उत्तराखंड के घराट
-कभी पिसाई का एकमात्र साधन थे घराट, सुनसान गदेरों के साथ हो गए लगभग समाप्त
देहरादून, । पहाड़ की जीवनशैली और लोकसंस्कृति का अहम हिस्सा रहे घराट अब इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं। कभी गांवों में अनाज पिसाने का एकमात्र साधन माने जाने वाले घराट आज सुनसान गदेरों और वीरान पगडंडियों के बीच अपनी अंतिम सांसें लेते दिखाई दे रहे हैं।
पहाड़ी इलाकों में बहते छोटे-छोटे गदेरे (जलधाराएं) घराटों की जीवनरेखा हुआ करते थे। इन गदेरों के किनारे लकड़ी और पत्थरों से बने घराटों में पानी की धार से चक्की चलती थी, जिसमें गांव के लोग गेहूं, मडुवा, झंगोरा और मक्का जैसे अनाज पिसवाते थे। उस दौर में घराट केवल पिसाई का साधन ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप के भी केंद्र हुआ करते थे। लोग अनाज की बोरियां लेकर आते, अपनी बारी का इंतजार करते और इसी दौरान गांव की खबरें, लोककथाएं और आपसी संवाद भी चलता रहता था।
समय के साथ तकनीक और आधुनिकता ने पहाड़ की इस पारंपरिक व्यवस्था को पीछे छोड़ दिया। गांवों में बिजली से चलने वाली आटा चक्कियां और शहरों से पैक आटा आने लगा, जिससे घराटों की उपयोगिता धीरे-धीरे कम होती चली गई। इसके साथ ही पलायन की मार ने भी गांवों की रौनक कम कर दी। जहां कभी गदेरों के किनारे घराटों की खटर-पटर गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ है।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक हर गांव या उसके आसपास एक-दो घराट जरूर होते थे। घराट चलाने वाले परिवारों की आजीविका भी इसी से चलती थी। लेकिन अब अधिकांश घराट या तो जर्जर हो चुके हैं या पूरी तरह बंद हो गए हैं।
पर्यावरण और लोकसंस्कृति से जुड़े जानकारों का मानना है कि घराट केवल पिसाई की पारंपरिक तकनीक ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण और प्रकृति के अनुकूल जीवन शैली का भी उदाहरण थे। यदि इन्हें संरक्षित किया जाए तो ये ग्रामीण पर्यटन और पारंपरिक तकनीक के अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज मिलकर इस विलुप्त होती धरोहर को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं, त्रताकि आने वाली पीढ़ियां भी पहाड़ की इस अनूठी परंपरा को समझ सकें और उससे जुड़ाव महसूस कर सकें।

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